माँ कुदरगढ़ी देवी

माँ कुदरगढ़ी (बागेश्वरी) देवी धाम, सूरजपुर

मंदिर के बारे में

माँ कुदरगढ़ी (बागेश्वरी) देवी धाम, सूरजपुर

भारत के हृदय स्थल मध्यप्रदेश के दक्षिणपूर्व भाग में ‘‘धान की कोठी‘‘ छत्तीसगढ़ राज्य स्थित है। छत्तीसगढ़ के उत्तरांचल में आदिवासी बहुल संभाग सरगुजा है। यहाँ की प्राकृतिक सौंदर्यता, हरियाली, ऐतिहासिक व पुरातात्विक स्थल, लोकजीवन की झांकी, सांस्कृतिक परंपराएं, रीति-रिवाज, पर्वत, पठार, नदियाँ कलात्मक आकर्षण बरबस ही मन को मोह लेते हैं। 01 जनवरी 2012 को सरगुजा जिले का विभाजन कर दो नये जिले बलरामपुर-रामानुजगंज एवं सूरजपुर बनाये गये। सरगुजा संभाग मुख्यालय अम्बिकापुर से लगभग 80 कि0मी0 की दूरी पर सूरजपुर जिला अंतर्गत ओड़गी तहसील में वन देवी मां कुदरगढ़ी धाम है। यह पुरातात्विक, ऐतिहासिक एवं प्राचीन पावन धर्मिक स्थल ओड़गी विकास खण्ड क कुदरगढ़ पहाड़ पर स्थित है।

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स्थिति और विस्तार –

छत्तीसगढ़ राज्य के वनमण्डल सूरजपुर अन्तर्गत ओड़गी ब्लाक मुख्यालय से लगभग छः किलो मीटर की दूरी पर उत्तर पश्चिम मे वन परिक्षेत्र कुदरगढ़ का कुदरगढ़ पर्वत स्थिति हैं। कुदरगढ़ देवी धाम ओडगी ब्लाक के ग्राम पंचायत कुदरगढ़ में आता हैं। इस पहाड़ पर जगत जननी मां कुदरगढ़ी देवी का निवास होने के कारण इसका नाम कुदरगढ़ पड़ा। कुदरगढ़ को पहले कुरियागढ़ के नाम से जाना जाता था। यह वन खंड धने जंगलों, लताओं एवं जल सोतों से भरा है। इस पहाड़ पर मनुष्य का निवास स्थान नही है। यहां अहिंसक वनचर पशु-पक्षी पाये जाते हैं। कुदरगढ पर्वत का पठार पांच किलोमीटर लम्बा और तीन किलोमीटर चौड़ा है। वनों में सरई, धवरा, तेंदू, महुआ आदि पेड़ों के साथ मोहलाईन व अन्य प्रकार की लताएँ पाई जाती हैं।

कुदरगढ़ का प्राकृतिक सौंदर्य-

वन देवी का निवास स्थल कुदरगढ़ अत्यंत मनोहारी है। यहां कल-कल करते झरने की आवाज, नाचते मोरों और बंदरों की टोली बरबस मन को मोहित करने वाली है। पहले इस घनाघेर जंगल में शेर की दहाड़ भी सुनाई देती थी। वर्तमान में भी यदा-कदा शेर भ्रमण के निशान दिखाई पड़ते हैं। कुदरगढ़ पहाड़ी पर लंबे-लंबे साल वृक्ष, गगनचुंबी पहाड़ी चोटियां केतकी पुष्पों से युक्त नाले, केले का बगीचे लगे हुए है। कुदरगढ़ की पहाड़ी पर प्राचीन गुफा, भित्ति चित्र और शैल चित्र इसके इतिहास को प्रमाणित करते हैं। कुदरगढ़ धाम में आने वाला हर व्यक्ति प्राकृतिक सौंदर्य और मां की आराधना से भाव विभोर हो उठता है।

about

कुदरगढ़ का नामकरण-

छत्तीसगढ़ को रामायण काल में दंडकारण्य के नाम से जाना जाता था। इसी सघन वन के लगभग 1500 फीट की ऊंचाई पर शक्तिपीठ मां बागेश्वरी बाल रूप में कुदरगढ़ी देवी के नाम से विराजमान हैं। सरगुजिहा बोली में दौड़ना को कुदना कहा जाता है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि जो व्यक्ति इस पहाड़ पर कूदते – कूदते चढ़ता है, वही चढ़ पाता है और मां कुदरगढ़ी का दर्शन पाता है।

किंवदंतियां एवं मान्यताएं-

सरगुजा अंचल में जनश्रुति प्रचलित है कि बनवास काल में भगवान श्री राम लक्ष्मण और माता सीता ने इस पर्वत पर मां वन देवी की पूजा अर्चना की थी। यह संपूर्ण भू-भाग त्रेता युग में दंडकारण्य के नाम से जाना जाता था। जहां अनेक राक्षसों का निवास था। इस क्षेत्र में खरदूषण, त्रिसरा और सुपणखा का राज्य था।

वनवास काल में भगवान श्रीराम छत्तीसगढ़ में प्रवेश सरगुजा अंचल के वर्तमान कोरिया जिले के सीतामढ़ी हर चौका से किए थे। यहां इनसे संबंधित अनेक स्थल विख्यात हैं। ऐसा उल्लेखित है कि सुतिक्षण ऋषि के आश्रम में भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण सहित विश्राम किए थे।

जनमान्यता है कि प्रभु श्रीराम के विश्राम करने के कारण यह अंचल (अम्बिकापुर,सरगुजा) विश्रामपुर के नाम से जाना जाता था। वर्तमान अंबिकापुर सन 1904 तक विश्रामपुर के नाम से जाता था। सरगुजा अंचल के विभिन्न क्षेत्रों में भगवान श्री राम से संबंधित स्थल किंवदंतिया सुनने और देखने को मिलते हैं।

इनमें सीतामढ़ी, हर चौका, कुदरगढ़, जोगीमाड़ा,लक्ष्मण पंजा, सीता लेखनी, रक्सगंडा, सारासोर, प्रतापपुर के पास शिवपुर। शिवपुर के संबंध में लोक मान्यता प्रचलित है कि भगवान श्रीराम ने शिवलिंग की स्थापना अपने कर कमलों से कर पूजा अर्चना की थी। यहीं नाले के समीप सीता पांव जगह भी है। इसके बाद मरहट्ठा का लक्ष्मण पंजा, विलद्वार गुफा, विश्रामपुर (वर्तमान अंबिकापुर), देवगढ़, महेशपुर, लक्ष्मणगढ़ और रामगढ़ का सीता बइंगरा, लक्ष्मण बइंगरा, जोगीमाड़ा, सीता कुंड, जानकी तालाब, आदि स्थल श्री राम के निवास को प्रमाणित करते हैं।

राजा बालंद और कुदरगढ़ के संबंध में किंवदंतियां-

कुदरगढ़ के संबंध में एक मान्यता प्रचलित है कि मध्य प्रदेश के सीधी जिला के मड़वास का खैरवार क्षत्रिय राजा बालंद कुदरगढ़ी माता बाल देवी का प्रथम सेवक था। इसका राज्य काफी फैला था। राजा बालंद अन्य राजाओं से युद्ध में पराजित होकर शहडोल जिला के बिछी नामक स्थान पर रहता था।

राजा बालंद ने शहडोल से सरगुजा अंचल के कोरिया जिले के चांगभखार, पटना और सूरजपुर जिले के कुदरगढ़ क्षेत्र में अपना अधिकार फैलाया था। कोरिया जिले के पटना क्षेत्र में बालम पोखरा बालम तालाब आज भी है। सूरजपुर जिले के ओड़गी विकासखंड के कुदरगढ़ पहाड़ पर बालमगढ़, तमोर पिंगला अभ्यारण क्षेत्र के पुतकी गांव के बालमगढ़ पहाड़ी पर गढ़ के अवशेष, चांदनी बिहारपुर क्षेत्र के महोली गांव की गढ़वतिया पहाड़ी पर बालमगढ़ के अवशेष बिखरे पड़े हैं।

about

राजा बालंद दुर्गा जी का भक्त था, और शक्ति की उपासना करता था। लोक मान्यता प्रचलित है कि राजा बालंद आल्हा उदल के समय में था। वह भी शक्ति का उपासक था। राजा बालंद कुदरगढ़ पहाड़ी पर मां बागेश्वरी देवी की आराधना करता था। राजा बालंद अपनी इष्ट देवी बागेश्वरी माता कुदरगढ़ी को मानता था। माता के आज्ञा के बिना कोई कार्य नहीं करता था।

श्री भूमिनाथ चतुर्वेदी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि राजा बालंद बहादुरी से राज्य की सीमा बढ़ाना चाहता था। इसके लिए वह कभी-कभी आतंक मचाता था, जिससे लोगों में चिंता बनी रहती थी। राजा के निवास के बारे में किसी को पता नहीं रहता था। इसी आयाम में चौहान वंश के राजपूत तीर्थ यात्रा हेतु सरगुजा पधारे अपनी बहादुरी से भैया बहादुर की उपाधि प्राप्त की तथा वर्तमान शासन (लगभग 17 वी शताब्दी) व्यवस्था को ना मानने वालों को भी तथा आतंक फैलाने वाले कई बहादुरों को उन्होंने परास्त किया। साथ ही बालंद को भी हरा कर के क्षेत्र को प्राप्त कर लिया। राजा बालंद की चौहान वंश से युद्ध की बात भैया महावीर सिंह चांगभखार ने भैया बहादुर शिवप्रसाद सिंह को पत्र लिखकर बताया था कि राजा बालम को हराकर उसे राज्य को लिया गया है।